
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी को हिमांशु जोशी की कहानियों के बगैर पहचाना नहीं जा सकता। हिंदी कहानी ने जितनी भी रचनात्मक मंजिलें तय की हैं; उन रचना-यात्राओं और मंजिलों पर उनकी कोई-न-कोई कहानी आगे बढ़ती या मंजिल पर मौजूद मिलती है। हिमांशु जोशी कहानी नहीं लिखते और न इनकी कहानियाँ बँधे-बँधाए ढाँचे में रूपाकार ग्रहण करती हैं; बल्कि वे मानस को आंदोलित करके अपना विधागत स्वरूप और महत्ता प्राप्त करती हैं। घटना; बात या सरोकार को कहानी की संवेदनात्मक सिद्धि दे देना उनकी नितांत अपनी विलक्षण कथन-प्रतिभा और उपलब्धि है। उनकी कहानियों में रचना और जीवन की अद्वितीय अन्विति है...कैसे जीवन-यथार्थ रचना बनता है और रचना कैसे जीवन-यथार्थ का पर्याय बन जाती है; यह उनकी दुर्लभ सृजन की कालजयी प्रतीति है; जो स्मृति की धरोहर बन जाती है। उनकी कितनी कहानियों को याद करूँ... ‘जलते हुए डैने’; ‘अंततः’; ‘रास्ता रुक गया है’; ‘काला धुआँ’; ‘तपस्या’ से लेकर विदेशी तथा अन्य अनुभव-भूमियों पर लिखी ‘सागर तट के शहर’; ‘अगला यथार्थ’; ‘आयतें’; ‘ह्वेनसांग...’; ‘एक बार फिर’ आदि को रेखांकित करूँ तब भी दसियों उत्कृष्ट कहानियाँ रेखांकित किए जाने की माँग करती हैं। यह सही है कि हिमालय की हर चट्टान से गंगा नहीं निकलती; लेकिन हिमांशु जोशी के अनुभव-जन्य हिमालय की प्रत्येक चट्टान से एक गंगा या एक उर्वरा नदी निश्चय ही निकलती है!’’
Page Count:
176
Publication Date:
2015-01-01
ISBN-10:
9351862682
ISBN-13:
9789351862680
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