
झारखण्ड एन्साइक्लोपीडिया (4 खण्डों में) - भारतीय इतिहास की पुस्तकों में 'झारखंड का इतिहास' और इसके जननायक प्रायः अनुपस्थित हैं। ऐसा क्यों? क्या सरलीकृत रूप में कहें तो भारत के इतिहास का सामान्य अर्थ इन्द्रप्रस्थ से लेकर पाटलिपुत्र तक का इतिहास मात्र ही है? क्या तुर्क मुगलकाल के दरबारी लेखक, अंग्रेज़ इतिहासकार और आज़ादी के बाद के राष्ट्रवादी या प्रगतिवादी इतिहासकार सबके लिए सप्तसिन्धु का क्षेत्र एवं गंगा-यमुना-दोआब ही पवित्र आर्यभूमि आर्यावर्त, हिन्दुस्तान के लिए नहीं था? कथित मुख्यधारा के भारतीय इतिहास में जब दक्षिण भारत के साथ ही सौतेलापन है तो झारखंड-कलिंग जैसे वन-प्रान्तर और सीमान्त क्षेत्रों को कौन पूछे? किन्तु झारखंडी हुलगुलानों की प्रतिध्वनियाँ अब अनसुनी नहीं रहेंगी। ज्वलन्त ऐतिहासिक प्रश्नों का उत्तर तलाशता एन्साइक्लोपीडिया का यह खंड - छोटानागपुर का इतिहास, संतालपरगना का इतिहास, सरायकेला-खारसांवा का इतिहास, सदानों का इतिहास, 1857 और झारखंड, भारत छोड़ो आन्दोलन में झारखंड, हो परम्परा, टाना भगत आन्दोलन आदि... आदि। बिर और बुरु यानी जंगल और पहाड़। झारखंड का नाम लेते ही प्रकृति के जो दो रूप आँखों के सामने झलकते हैं वे यही जंगल और पहाड़ हैं। झारखंडी जन, समुदाय और संस्कृति इन्हीं जंगलों-पहाड़ों में पलती-बढ़ती आज इस मुकाम तक आ पहुँची है। ये जंगल और पहाड़ इनके आराध्य भी हैं और पालनहार भी। जंगल और पहाड़ों के साथ-साथ झारखंड के समस्त भौगोलिक विकास, परिस्थिति-परिवेश की चर्चा अपने विषय के विभिन्न विद्वान-विशेषज्ञों ने इस खंड में की है यथा- झारखंड की भौगोलिक संरचना, भू-आकृति, नदियाँ और उनकी प्रकृति, वन सम्पदा, भूजल और भू-विज्ञान, कोयला और अन्य खनिज, कृषि एवं सिंचाई, ऊर्जा, परिवहन, पथ के साथ-साथ, हाट-बाज़ार और पर्यटन केन्द्र आदि-आदि। झारखंड सहित देश के अधिकांश आदिवासी बाहुल्य इलाक़ों ने विकास के पूँजीवादी अवधारणा से उत्पन्न दंश को झेला है। विस्थापन एवं पलायन विकास के उप-उत्पाद के रूप में सामने आये हैं। नेहरू-वेरियर एल्विन के पंचशील सिद्धान्तों से प्रेरित होकर विकास के विभिन्न कार्यक्रम अपनाये गये उसके कारण सरकारी सेवाओं में कुछ प्रतिशत झारखंडी आबादी भी दिखने लगी है। इस खंड में ऐसी ही श्वेत-श्याम तस्वीरें सजाई हैं, यथा- विकास रणनीति, स्वैच्छिक संस्थाओं की भूमिका, विस्थापन-पल
Page Count:
1568
Publication Date:
1900-01-01
ISBN-10:
9388434846
ISBN-13:
9789388434843
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